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धर्म आराधना का पर्व हैं चातुर्मास : सूरीश्वरजी म.सा

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महाराष्ट्र जैन वार्ता

भायंदर : चातुर्मास जीवन में नई दिशा, नई ऊर्जा, नया उत्साह नई चेतना देनेवाला पावन पर्व है। यह एक ऐसा पर्व है जो विश्व में सर्वाधिक समय तक चलता है, अर्थात् बारह महिनों में से चार माह मनाये जानेवाला पर्व, अहिंसा धर्म की पालना के लिये जैन धर्म में एक ही स्थान में रहकर धर्म आराधना करने का विधान है। इसीलिये हमारे गुरु भगवंत एक ही स्थान में प्रवास कर अपनी आत्मसाधना में तल्लीन रहते है और जिनशासन की प्रवचनों के माध्यम से, शिविर के माध्यम से हमें जाग्रत करते हैं।

उपरोक्त विचार परम पूज्य 451 दीक्षा दानेश्वरी आचार्य श्री गुणरत्न सूरीश्वरजी म. सा. के शिष्य रत्न आचार्य श्री रश्मिरत्न सूरीश्वरजी म. सा. के प्रशिष्य रत्न प. पु. आचार्य श्री 47 वर्ष संयम के आराधक आचार्य श्री संयमरत्न सूरीश्वरजी म. सा. ने श्री शंखेश्वर पार्श्वनाथ बावन जिनालय जैन मंदिर में चातुर्मास प्रवेश के बाद व्यक्त किये।

प्रवचन प्रभावक पन्यास प्रवर श्री चारित्ररत्न विजयजी म. सा. ने विशाल धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि, चार्तुमास में अपने समय का सही स्थान में निवेश करें, अर्थात् अपना मूल्यवान समय हम टीवी, मोबाईल आदि में न देकर कुछ नया ज्ञानार्जन करने का लक्ष्य रखें।

उन्होंने कहा कि वर्तमान में गुरु भगवंत ही हमारे तीर्थकरों के प्रतिनिधि है, साक्षात कल्पवृक्ष है, उनके द्वारा हमे धर्म को जानने का अवसर मिलेगा। गुरुदेव के साथ पन्यास प्रवर श्री हीररत्न विजयजी म. सा. आदि ठाणा व गुणज्ञरेखा श्रीजी, भवज्ञरेखा श्रीजी म. सा. आदि ठाणा 10 का भी प्रवेश हुआ। दीक्षा के 23 वर्ष बाद चारित्र रत्नजी आदि भायंदर पधारे हैं।

20 जुलाई से चातुर्मास शुरू हो रहा है व चार माह तक अनेक अनुष्ठान संपन्न होंगे। पद्मावती नगर से शुरू हुआ प्रवेशोत्सव विभिन्न मार्गों से होते हुए बावन जिनालय में धर्मसभा में तब्दील हुआ।

पन्यास प्रवर आर्यरक्षित विजयजी म. सा. ने भी मार्गदर्शन किया। इस अवसर पर विधायक गीता जैन, भाजपा नेता रवि व्यास, रवि बी जैन, ट्रस्टी सुरेश देवचंद शाह, अध्यक्ष मांगीलाल शाह, योगेश शाह, दीपक जैन, मांगीलाल सोलंकी आदि गणमान्य उपस्थित थे। संगीत की धूम अनीश राठौड़ ने जमायी।

इस वर्ष का चातुर्मास श्री शंखेश्वर पार्श्वनाथ बावन जिनालय जैन संघ, भायंदर (वेस्ट) में होगा। संपूर्ण कार्यक्रम के लाभार्थी रतिलाल रेड परिवार थे। दीक्षा के बाद गुरुदेव पहलीबार भायंदर पधारे हैं। आपके पूरे परिवार ने दीक्षा लेकर जीवन शासन को समर्पित किया है।

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