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राह भटकने नहीं देता वही गुरु : प. पू. प्रवीणऋषिजी म. सा.

maharashtra jain warta • Maharashtra Jain Warta, MJW - Social News, MJW Daily News(Post Slider), Other, People, Social • September 17, 2025
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पुणे : हमारे जीवन में बनने वाले रिश्ते हम स्वयं तय नहीं करते, बल्कि वे अपने आप ही बन जाते हैं। इन रिश्तों के सूत्रधार हम नहीं होते, बल्कि वे कर्म और संयोग से हमसे जुड़ते हैं। यानी इन रिश्तों के माध्यम से दो जीवों का बंधन जुड़ता है।

रिश्ते का मूल आधार विश्वास और पारदर्शिता होती है। विश्वास रिश्तों की नींव है, जबकि पारदर्शिता उस रिश्ते का दर्पण है। लेकिन एक बार यदि इन दोनों में दरार आ जाए, तो वे फिर कभी नहीं जुड़ पाते।

कई बार दूर के व्यक्ति से धोखा मिलने से अधिक खतरनाक और घातक होता है अपने ही नज़दीकी इंसान द्वारा पीछे से किया गया वार। ऐसे रिश्तों से संदेह का भूत हमेशा के लिए हमारे सिर पर सवार हो जाता है।

किस पर विश्वास करना है, यही हमारी असली कसौटी होती है। ऐसे समय में अंधेरी राह पर प्रकाश दिखाने के लिए गुरु-शिष्य का संबंध हमेशा आदर्श ठहरता है। मन में उठे तूफ़ान को शांत करने वाले, उसे रोकने वाले और सही दिशा देने वाले हाथ गुरु के होते हैं।

जो हमें परखकर शिष्य के रूप में स्वीकार करता है, वही गुरु होता है। किसी भी परिस्थिति में जो हमें मज़बूती से थामकर राह भटकने नहीं देता, वही सच्चा गुरु होता है। गुरु-शिष्य का यह रिश्ता हमेशा उच्चतम स्तर का होता है।

जब मन के विचार और उनसे उठे तूफ़ान हमें अपने आप से अलग नहीं होने देते, तब हम बाहर राह खोजने लगते हैं। लेकिन जब गुरु हमारे भीतर प्रभु, संयम और पवित्रता की ज्योति प्रज्वलित करते हैं, तब मन का अंधकार दूर हो जाता है। गुरु प्रभु से जुड़ाव की मज़बूत डोर बनाने में मदद करते हैं।

जब हम सब कुछ खो चुके होते हैं, तब समर्पण की भावना जागती है और परमात्मा की प्राप्ति होती है। प्रभु से जुड़ा हुआ श्रद्धा और भक्ति का संबंध सर्वोत्तम बन जाता है। गुरु द्वारा बोए गए श्रद्धा और भक्ति के बीज से हमेशा सुदृढ़ रिश्तों का अंकुर फूटता रहता है।

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