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व्यवस्था और मानसिकता बदलने की चुनौती : प. पू. प्रवीणऋषिजी म. सा.

maharashtra jain warta • Maharashtra Jain Warta, MJW - Social News, MJW Daily News(Post Slider), Other, People, Social • September 26, 2025
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पुणे : हमारी संस्कृति और परंपरा में अनेक रीति-रिवाज और व्यवस्थाएँ समय के साथ चली आ रही हैं। इनमें से कुछ परंपराएँ हमारी संस्कृति के अनुरूप हैं, तो कुछ का केवल दिखावा किया गया है। ऐसी परंपराओं को बदलने के लिए कोई स्वतंत्र व्यवस्था मौजूद नहीं है। यह व्यवस्था एक रात में बदलने वाली नहीं है और न ही समाज की मानसिकता को एक ही रात में बदला जा सकता है। इसके लिए निरंतर परिश्रम करना ही पड़ेगा।

जो लोग समाज की व्यवस्था और परंपराओं में परिवर्तन लाने का प्रयास करते हैं, नई व्यवस्था बनाने की कोशिश करते हैं, उन्हें अनगिनत कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। हमें सत्य या सिद्धांतों से शुरुआत करने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि यह सत्य और सिद्धांत शाश्वत हैं।

इन्हें सही ढंग से आगे बढ़ाने के लिए उचित प्रबंधन की आवश्यकता है। कभी-कभी पीढ़ियों से चली आ रही सुविधाएँ और व्यवस्थाएँ इतनी हमारी आदत बन जाती हैं कि हमें उन्हीं में सुख महसूस होने लगता है।

‘लेकिन यह ऐसा ही क्यों?’, ‘यह सही है या गलत है?’ ऐसे साधारण प्रश्न भी हमारे मन में उत्पन्न नहीं होते। परंपरा का प्रभाव इतना गहरा होता है कि जो चल रहा है, उसे ही हम सही मानकर स्वीकार कर लेते हैं।

कभी-कभी हमें पता होता है कि व्यवस्था में चल रही बातें अनुचित हैं और हम उनके बारे में अप्रत्यक्ष रूप से चर्चा भी करते हैं, परंतु उनके विरोध में कदम उठाने का साहस नहीं करते। ‘मैं अकेला क्या कर पाऊँगा’ इस भय से हम परंपरा या व्यवस्था के विरुद्ध कदम बढ़ाने से पीछे हट जाते हैं।

हमें लगता है कि यह काम मेरा अकेले का नहीं, बल्कि इसके लिए सामूहिक शक्ति चाहिए, और यही सोचकर हम रुक जाते हैं। उससे भी अधिक यह डर सताता है कि अगर मैंने परंपरा के खिलाफ प्रश्न उठाया, तो मुझे विरोधी मान लिया जाएगा।

इस भय के कारण हम अपने मन में चल रही हलचल को दबा देते हैं। हम यह सोचते हैं कि मेरे कार्य के विषय में लोग क्या कहेंगे, परंतु हमें लोगों से अधिक ईश्वर या अपने अंतर्मन से पूछना चाहिए। वह क्या कह रहा है, उसके मत को प्राथमिकता देनी चाहिए।

समाज व्यवस्था के पीछे छिपे असहायता, अस्वस्थता और भय के चेहरे को पहचानना जरूरी है। मन में भय की भावना होने के कारण हम सत्य, अपने हित और धर्महित की बातें स्वीकार ही नहीं करते।

इसलिए, भले ही कल कोई व्यवस्था बदलने के लिए आगे बढ़े, यह कहना कठिन है कि समाज उस बदलाव को स्वीकार करने के लिए तैयार होगा। इसके लिए सबसे पहले मन में यह प्रश्न उठना चाहिए – ‘यह ऐसा ही क्यों?’ जब यह प्रश्न और उसके पीछे का दृष्टिकोण स्पष्ट होगा, तभी हम उस पर विचार कर पाएँगे और समाधान खोज पाएँगे।

व्यवस्था बदलने के लिए नए मार्ग पर चलते समय अनेक कठिनाइयाँ सामने आने वाली ही हैं। परंतु इसके लिए केवल बातें करने की बजाय अपने कर्म पर अधिक ध्यान देना होगा। जहाँ आपकी आस्था और सही व्यवस्था का संगम होगा, वहीं वास्तविक ईश्वरीय अनुभव की प्राप्ति होगी।

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