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सर्वोत्तम लक्ष्य के लिए सर्वोत्तम ध्यान : प. पू. प्रवीणऋषिजी म. सा.

maharashtra jain warta • Maharashtra Jain Warta, MJW - Social News, News, News Slider, Social • October 30, 2025
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पुणे : हमारा जीवन बहुत सुंदर है। इस सुंदर जीवन को सर्वोत्तम बनाने की कला हमारे पास है। लेकिन हम अक्सर केवल इतना ही चाहते हैं कि हमारा शरीर स्वस्थ रहे और जीवन में सुख मिले। ऐसी छोटी-छोटी अपेक्षाओं में उलझकर हम अपने सुंदर जीवन को सर्वोत्तम बनाने की प्रक्रिया में स्वयं को नहीं झोंक पाते। क्या हमें अपने साथ-साथ दूसरों का जीवन भी श्रेष्ठ बनाने की कला आती है? इसके लिए सबसे पहले हमें यह देखना होगा कि हमारे पास कैसा कर्म है।

कर्म के परिणाम हमारे हाथ में होते हैं, लेकिन उसके प्रभाव हमारे आसपास दिखाई देते हैं। जैसे क्रोध का उद्रेक हमारे भीतर होता है, पर उसके परिणाम सब पर पड़ते हैं; उसी तरह प्रेम के साथ भी होता है। प्रेम की भावना हमारे भीतर खिलती है, लेकिन उसके प्रभाव चारों ओर फैलते हैं। ऐसी ही भावना हमें अपने लक्ष्य के प्रति रखनी चाहिए।

किसी पूज्य व्यक्ति के आचार-विचार में सम्पूर्ण विश्व को पूज्य और श्रेष्ठ बनाने की प्रक्रिया चलती रहती है। उन्होंने स्वयं अपना लक्ष्य निर्धारित किया होता है। इसलिए उनका संकल्प हर जीव, हर सृष्टि, हर प्राणी को श्रेष्ठ बनाने का होता है। क्या ऐसा संकल्प हमारे भीतर कभी जागृत हुआ है?

अक्सर हम केवल दूसरों का उपयोग करते हैं, लेकिन क्या हम उन्हें श्रेष्ठ बनाने का प्रयास करते हैं? शायद इसका उत्तर “नहीं” ही होगा। इसलिए जैसे हम भीतर से हैं, वैसे ही हम अपना लक्ष्य तय करते हैं और उसी भाव से ध्यान करते हैं।

यह तो हुआ दूसरों के संदर्भ में, पर क्या हमने अपने ही लक्ष्य के बारे में सोचा है? दैनिक जीवन में हम जो क्रियाएँ करते हैं जैसे सोना, बोलना, सुनना, खाना, समय देना इन बातों को हम कितना महत्व देते हैं? वास्तव में ये हमारे जीवन का अविभाज्य हिस्सा हैं।

लेकिन हम केवल सोने का समय आया तो सो जाते हैं, खाने का समय आया तो खा लेते हैं बस इतनी ही क्रिया हमारे स्वभाव का हिस्सा बन जाती है। पर इसी क्रिया को सर्वोत्तम या श्रेष्ठ बनाने का प्रयास कीजिए। मैं जो श्वास लेता हूँ, जो शब्द बोलता हूँ, जो सुनता हूँ मैं उन्हें श्रेष्ठ बनाने का प्रयत्न करूँगा।

शरीर को केवल स्वस्थ रखने की चिंता करने के बजाय, यह चिंतन करना चाहिए कि मेरा शरीर श्रेष्ठ कैसे बने। यदि आप सच में चाहते हैं कि शरीर स्वस्थ रहे, तो दैनिक क्रियाओं को श्रेष्ठ दृष्टि से देखिए। जब आप अपने लक्ष्य को श्रेष्ठ बनाने का प्रयास शुरू करते हैं, तब आपका चिंतन भी श्रेष्ठ बन जाता है। और यही एक ऐसा यात्रा-पथ आरंभ करता है जो आपको अद्भुत अनुभव प्रदान करता है।

ऐसे श्रेष्ठतम व्यक्तित्व आपको श्रेष्ठ बनाते हैं, इसलिए उनके सान्निध्य का लाभ अवश्य उठाना चाहिए। मिट्टी के एक गोले को आकार देकर घड़ा बनाना आसान है; किसी कपड़े को आकार देना भी आसान है, लेकिन किसी व्यक्ति के जीवन को आकार देना उतना ही कठिन है।

इसलिए “मैं श्रेष्ठ बनने का प्रयास करूँगा” यह संकल्प मन में रखना चाहिए। सर्वोत्तम लक्ष्य के लिए सर्वोत्तम ध्यान करना चाहिए। हमारा यह ध्यान अपने लक्ष्य से जुड़ा होना चाहिए। यदि यह डोर अहंकार या वासना से जुड़ गई, तो उससे निकलने वाली प्रतिध्वनि अहंकार और वासना की ही होगी।

लेकिन यही डोर यदि ईश्वर से, पूज्य और वंदनीय व्यक्तियों से जुड़ गई, तो उससे उत्पन्न होने वाला नाद जीवन को एक नया, श्रेष्ठ और दिव्य अर्थ देने वाला होगा।

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