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सल्लेखना व्रत के साथ पन्नालाल गंगवाल जी का समाधि मरण

maharashtra jain warta • Maharashtra Jain Warta, MJW - Social News, MJW Daily News(Post Slider), Other, People, Social • January 28, 2026
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पुणे : पुणे के महेंद्र गंगवाल के पिताजी पन्नालालजी गंगवाल ने दिगंबर जैन परंपरा के अनुसार सल्लेखना व्रत (समाधि मरण) धारण कर शांत भावों के साथ प्रभु चरणों में अपने प्राण समर्पित किए। उनका देहावसान 24 जनवरी को पूर्ण संयम, समता और शांति भाव से हुआ।

पन्नालालजी गंगवाल का जन्म 6 जून 1931 को कन्नड ग्राम, जिला औरंगाबाद (संभाजीनगर) में हुआ। अत्यंत साधारण एवं गरीब परिस्थितियों में जीवन व्यतीत करने के बावजूद उन्होंने संपूर्ण जीवन धर्म और संयम के मार्ग पर अडिग रहते हुए व्यतीत किया।

उन्होंने अपने जीवनकाल में 14 वर्षों तक अनंत व्रत तथा 5 वर्षों तक पंचमेरु व्रत का कठोर तप किया। प्रत्येक अष्टमी एवं चतुर्दशी को वे नियमित रूप से एकासन उपवास का पालन करते थे। उन्होंने भारत के विभिन्न तीर्थ क्षेत्र, सिद्ध क्षेत्र एवं अतिशय क्षेत्रों की वंदना की तथा लगातार 50 वर्षों से अधिक समय तक प्रतिवर्ष कन्नड से कचनेर तक पैदल तीर्थ यात्रा संपन्न की।

अपने बच्चों को जैन धर्म के संस्कार प्राप्त हों, इस उद्देश्य से उन्होंने उन्हें गुरुकुल में अध्ययन हेतु भेजा। पन्नालालजी की अंतिम इच्छा थी कि वे सल्लेखना पूर्वक समाधि मरण प्राप्त करें। उनकी इस इच्छा का सम्मान करते हुए गंगवाल परिवार ने गुरुदेव के सान्निध्य में उन्हें सल्लेखना व्रत प्रदान करने का निर्णय लिया।

सौभाग्यवश उस समय पूज्य मुनिश्री कुंथुसागर जी गुरुदेव वाकड परिसर में विराजमान थे। उन्हें इस विषय की जानकारी दी गई, जिसके पश्चात उन्होंने पन्नालाल जी को उपदेश प्रदान किया। विधिपूर्वक गृहत्याग कराते हुए 19 जनवरी को उन्होंने गुरुदेव के चरणों में सल्लेखना व्रत धारण किया और 24 जनवरी को शांत भाव, समता एवं समाधि अवस्था में अपना देह त्याग किया।

पन्नालालजी गंगवाल का संपूर्ण जीवन तप, त्याग, संयम और धर्मनिष्ठा का प्रेरणादायी उदाहरण रहा, जो समाज के लिए सदैव मार्गदर्शक बना रहेगा।

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