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स्मृतियों के बंधन तोड़ना सीखें : प. पू. प्रवीणऋषिजी म. सा.

maharashtra jain warta • Maharashtra Jain Warta, MJW - Social News, MJW Daily News(Post Slider), News, News Slider, Other, People, Social • September 11, 2025
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पुणे : जीवन-यात्रा में अनेक अनुभवों से अनेक स्मृतियाँ बनती हैं। इनमें से कुछ स्मृतियाँ अच्छी होती हैं और कुछ दुखदायी। प्रायः हम इन्हीं दुखद स्मृतियों को अपने साथ बाँधकर रखते हैं और उनमें ही उलझे रहते हैं। ऐसे मोह की ओर खींच ले जाने वाले स्मृतियों के बंधन को तोड़ना आना चाहिए, ऐसा प्रतिपादन प. पू. प्रवीणऋषिजी म. सा. ने किया।

उन्होंने कहा कि मोह का अर्थ है आकर्षण। जो न तो वर्तमान में है और न ही भविष्य में होने वाला है, फिर भी उसे बार-बार अनुभव करना या उसे सत्य मान लेना ही मोह की परिभाषा है। यह आकर्षण समाप्त करना आवश्यक है।

यही आकर्षण हमारी प्रगति में बाधा बनता है। जब हम किसी वस्तु या व्यक्ति को यह कहते हुए अपना मानते हैं कि वह केवल मेरी ही है, तो वास्तव में हम भ्रम में होते हैं। उस वस्तु या व्यक्ति का अपना स्वतंत्र अस्तित्व होता है।

वह अपने अनुसार जीवन जीता है। हम उसके अस्तित्व में न झाँक सकते हैं और न ही उसे समेट सकते हैं। अपनी प्रिय व्यक्ति ने हमारे अनुसार ही जीवन जीना चाहिए-यह हमारी निरर्थक जिद होती है। जब वह वैसे नहीं जीता जैसा हम चाहते हैं, तब वही प्रिय हमें अप्रिय लगने लगता है।

हम अपने ही शरीर को रोककर रख नहीं सकते, तो दूसरों के अस्तित्व को कैसे पकड़कर रख पाएँगे? लेकिन यही भ्रम हम वर्षों से पालते आए हैं। इसलिए चीज़ों को पकड़कर रखने के बजाय उन्हें छोड़ना सीखना चाहिए। यही स्मृतियों के साथ भी है।

अतीत की कोई घटना यदि हमारे दिल को चुभ गई हो, तो उसका असर लंबे समय तक रहता है। घटना तो एक बार घटती है, लेकिन उसकी यादें बार-बार लौट आती हैं। यही स्मृतियाँ पीड़ादायक होती हैं।

इन्हें हम हल नहीं कर पाते और यही मोह की प्रक्रिया है। सुख और दुख मेघ (बादल) की तरह हैं। जहाँ हम स्थिर होते हैं, वहीं वे बरसते हैं। उसी प्रकार जब आप ज्ञान की प्रक्रिया में स्थिर होते हैं, तो स्मृतियों के ये मेघ अपने आप छँट जाते हैं।

जब तक दुखद स्मृतियों के बादल सिर पर मंडराते रहते हैं, तब तक हम उनके चक्र में और उलझते जाते हैं। इसलिए इन दुखद स्मृतियों का लोप होना आवश्यक है। इसके लिए ज्ञान लेना, उस पर ध्यानपूर्वक विचार करना और समझने का प्रयास करना ज़रूरी है।

ज्ञान की प्रक्रिया भीतर घटित होनी चाहिए। ज्ञान केवल भावों को जानता है, वह भी वर्तमान क्षण के भावों को। इसलिए स्मृतियों के सागर में डूबने के बजाय हमें ज्ञान का अथाह सागर रचना चाहिए।

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