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हमारी संस्कृति दीपक प्रगटाने की है, दीपक बुझाने की नहीं : पं. राजरक्षितविजयजी

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पुणे : हमारी संस्कृति दीपक प्रगटाने की है। दीपक बुझाने की नही, इस तरह का मत पंन्यास राजरक्षितविजयजी, पंन्यास नयरक्षितविजयजी ने श्री शांतिनाथ जिनालय शांतिनगर सोसायटी जैन संघ कोंढवा व्यक्त किया।

पं. राजरक्षितविजयजी ने विशाल सभा में कहा कि, आज के अधिकांश अमीर, शिक्षित और शहरी लोग जन्मदिन की पार्टियाँ विकृत तरी के से मनाते हैं। केक काटना, मोमबत्तियाँ बुझाना, जन्मदिन वाले लड़के को मुक्का मारना, गुब्बारे फोड़ना, पॉप संगीत पर नाचना। चिल्लाना यह सारी गतिविधि अशोभनीय है।

जीवन को सुगंधित करने के लिए इस की आवश्यकता नहीं होती। परन्तु सद्गुणो की आवश्यकता हैं। कहां जन्म लेना है ये हमारे हाथ में नहीं है। मौत कब आ जाये पता नहीं। लेकिन जन्म और मृत्यु के बीच जीवन कैसे जीना है यह हमारे हाथ में है। धन, परिवार, प्रतिष्ठा और संपत्ति के पीछे जीवन का बहुत सारा समय बर्बाद हो जाता है।

अभी दस-पंद्रह साल बचे हैं। उसे समझकर आइए आज से ही परलोक सुधारने का प्रयास शुरू करें। परलोक को सुधारने के लिए परोपकार और पाप से डर ये दो गुण लाना बहुत जरूरी है। सूर्य प्रकाश देता है। नदी पानी देती है। वृक्ष फल और छाया प्रदान करता है। हम मनुष्य हैं और हमारी उदारता विशेष स्तर की होनी चाहिए।

बच्चों में करुणा विकसित करने के लिए जन्मदिन पर करुणा पार्टी का आयोजन करना चाहिए। जन्मदिन वाले लड़के के पास गायों को घास, कुत्तों को दूध, अस्पतालों में मरीजों को फल दिलवाना चाहिए। दीपक बुझाने की नही, दीपक ज्ञान का प्रतीक है। सभ्य माता-पिता को बच्चे के जन्मदिन पर केक पार्टी की बजाय करुणा पार्टी रखनी चाहिए।

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