हमें धरती पर मालिक नहीं बल्कि मेहमान बनकर रहना है: पं. राजरक्षित विजयजी
श्री आदिनाथ सोसायटी जैन संघमें किया मार्गदर्शन
महाराष्ट्र जैन वार्ता
पुणे : परलोक का स्मरण जितना प्रबल होता है, पाप उतना ही जल्द कम हो जाता है। हमें इस धरती पर मेहमान बनकर रहना है। मालिक बनकर नहीं.इस तरह के विचार श्री आदिनाथ सों. जैन संघ में पं. राजरक्षित विजयजी रखे।
पं. राजरक्षित विजयजी ने कहा कि जब अपना जन्म धरती पर हुआ तो हम मुट्ठी बांध कर आये थे। मृत्यु के समय हाथ खुले रह जाते है । जन्म के समय हमारे पास कुछ भी नहीं था। मृत्यु के समय हमारे पास कुछ भी नहीं रहेगा।
शरीर पर मौजूद सभी अंगूठियां, सोने की चेन, रिस्टवोच रिश्तेदारों ले लेंगे। कड़ी मेहनत, अन्याय, भ्रष्टाचार से प्राप्त किया हुवा धन नहीं आएगा. लेकिन धन पाने के लिए किए गए काले पाप परलोक में भी साथ आयेंगे ।
धन पाने के लिए भूत की तरह दौड़ने वाला आदमी मृत्यु के बाद अख़बार में चार-पांच लाइन का शोक सन्देश के बाद जगत मे से विस्मृत हो जाता है । जन्म से पहले हमारे पास नहीं था और जो मृत्यु के बाद हमारे पास रहेने वाला नहीं है वो भोतिक पदार्थोको मेरा मानना बड़ी मूर्खता का कारण है ।
मृत्यु से डरें नहीं बल्कि उसे प्रतिदिन याद रखें। क्योंकि मृत्यु का स्मरण जीवन का रसायन है। द पावर विथिन पुस्तक में डॉ. अलेक्जेंडर कैनोन ने 1883 लोगों पर अध्ययन करने के बाद यह घोषणा की, के शरीर और आत्मा दोनों अलग-अलग हैं।
मृत्यु के बाद शरीर राख बन जाता है। आत्मा दूसरे भव में चली जाती है। शरीर की चिंता बहोत की अब आत्मा की चिंता शुरू करें। चारधाम की यात्रा के लिए बैग-बिस्तर तैयार करने वाले हम परलोक की महायात्रा के लिए कितनी तैयारी की है ? आइए…त्रुटि सुधार ने का सघन प्रयास करे…