कुंथलगिरी में आचार्य श्री वर्धमानसागरजी महाराज का सल्लेखना पूर्वक समाधिमरण
देशभर के जैन समाज में शोक की लहर, अंतिम दर्शन के लिए उमड़ रहे हैं हजारों श्रद्धालु
महाराष्ट्र जैन वार्ता
भूम (धाराशिव) : महाराष्ट्र के धाराशिव जिले के भूम तहसील स्थित पवित्र दिगंबर जैन सिद्धक्षेत्र कुंथलगिरी में परम पूज्य 108 आचार्य श्री सन्मतिसागरजी महाराज के परम प्रभावक शिष्य एवं उत्तराधिकारी, क्षपकराज परम पूज्य 108 आचार्य श्री वर्धमानसागरजी महाराज ने शनिवार, 5 जुलाई 2026 को प्रातः 11:34 बजे सल्लेखना पूर्वक समाधिमरण प्राप्त किया। उनके समाधिमरण के समाचार से देशभर के दिगंबर जैन समाज में गहरा शोक व्याप्त है। कुंथलगिरी में अंतिम दर्शन और श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए हजारों श्रद्धालु पहुंच रहे हैं।
आचार्य श्री वर्धमानसागरजी महाराज ने 24 जून 2026 को प्रातः 8:40 बजे कुंथलगिरी सिद्धक्षेत्र में यम-सल्लेखना का संकल्प लिया था। इसके बाद उन्होंने पूर्ण समता, आत्मचिंतन, वैराग्य और तप की भावना के साथ अपनी अंतिम साधना की।
सल्लेखना के दौरान देश के अलग-अलग राज्यों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु कुंथलगिरी पहुंचे। पूरा सिद्धक्षेत्र नमोकार मंत्र, गुरु वंदना, स्वाध्याय और भक्ति के माहौल से भक्तिमय बना रहा।
आचार्य श्री वर्धमानसागरजी महाराज का जन्म 3 जनवरी 1951 को महाराष्ट्र के कोल्हापुर जिले के निमशिरगांव में हुआ था। उनका पूर्वाश्रम नाम यशवंत पाटील था।
उच्च शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने कुछ समय तक शिक्षक के रूप में सेवा दी, लेकिन वैराग्य की भावना जागृत होने पर उन्होंने सांसारिक जीवन का त्याग कर दिगंबर जैन संयम मार्ग अपना लिया।
वर्ष 2004 में इचलकरंजी में आचार्य श्री 108 सन्मतिसागरजी महाराज (दक्षिण) के सान्निध्य में उन्होंने दिगंबर मुनि दीक्षा ग्रहण की। अपनी कठोर साधना, तप और संयम के कारण 18 फरवरी 2011 को उन्हें आचार्य पद से अलंकृत किया गया।
दिगंबर जैन परंपरा में यम-सल्लेखना को अत्यंत पवित्र और सर्वोच्च आध्यात्मिक साधना माना जाता है। यह मृत्यु नहीं, बल्कि पूर्ण जागरूकता, समता और वैराग्य के साथ जीवन की अंतिम साधना का मार्ग है।
आचार्य श्री वर्धमानसागरजी महाराज ने अपने पूरे जीवन में तप, त्याग, संयम और आत्मकल्याण का संदेश दिया, जिसे श्रद्धालु हमेशा प्रेरणा के रूप में याद करेंगे।
कुंथलगिरी दिगंबर जैन समाज का एक प्राचीन और पवित्र सिद्धक्षेत्र है। यह भूमि अनेक संतों की तपस्या और समाधि की साक्षी रही है।
वर्ष 1955 में चरित्र चक्रवर्ती आचार्य श्री 108 शांतिसागरजी महाराज की प्रथम यम-सल्लेखना भी इसी पावन भूमि पर संपन्न हुई थी। इसके बाद 15 से अधिक मुनियों और आर्यिकाओं ने यहां समाधि साधना पूर्ण की है, जिससे कुंथलगिरी का धार्मिक महत्व और भी बढ़ गया है।
आचार्य श्री वर्धमानसागरजी महाराज के समाधिमरण के बाद देशभर से संत, साधु, आर्यिकाएं, समाज के पदाधिकारी और हजारों श्रद्धालु कुंथलगिरी पहुंच रहे हैं।
सभी नम आंखों से अपने पूज्य गुरुदेव को श्रद्धांजलि अर्पित कर रहे हैं। श्रद्धालुओं का कहना है कि आचार्य श्री का तप, त्याग, संयम और सादा जीवन आने वाली पीढ़ियों को हमेशा धर्म और आत्मकल्याण के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता रहेगा।
