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आचार्य श्री 108 वर्धमानसागरजी महाराज की यम-सल्लेखना का 11वां दिन

maharashtra jain warta • Maharashtra Jain Warta • July 3, 2026
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कुंथलगिरी (धाराशिव) : महाराष्ट्र के धाराशिव जिले की भूम तहसील स्थित प्राचीन एवं पावन दिगंबर जैन सिद्धक्षेत्र कुंथलगिरी इन दिनों श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक भावनाओं का केंद्र बना हुआ है। यहां विराजमान वात्सल्य रत्नाकर, आचार्य श्री 108 सन्मतिसागरजी महाराज के परम शिष्य, क्षपकराज आचार्य श्री 108 वर्धमानसागरजी महाराज (दक्षिण) की यम-सल्लेखना साधना का आज 11वां दिन चल रहा है।

आचार्य श्री ने 24 जून 2026 को प्रातः 8:40 बजे सिद्धक्षेत्र कुंथलगिरी में यम-सल्लेखना का संकल्प ग्रहण किया था। तब से वे पूर्ण समता, आत्मचिंतन और वैराग्य भाव के साथ इस महान आराधना में लीन हैं।

गुरुवर की इस दिव्य साधना के दर्शन और अनुमोदना के लिए प्रतिदिन देशभर से हजारों श्रद्धालु कुंथलगिरी पहुंच रहे हैं। सिद्धक्षेत्र परिसर नमोकार मंत्र, गुरु वंदना और स्वाध्याय की मंगल ध्वनियों से गुंजायमान है।

आचार्य श्री 108 वर्धमानसागरजी महाराज का जन्म 3 जनवरी 1951 को कोल्हापुर जिले के निमशिरगांव में हुआ था। गृहस्थ जीवन में उनका नाम पायगोंडा आदगोंडा पाटील था।

उच्च शिक्षा प्राप्त करने के पश्चात उन्होंने कुछ समय तक आदर्श शिक्षक के रूप में भी कार्य किया। बाद में वैराग्य जागृत होने पर उन्होंने सांसारिक जीवन का त्याग कर संयम मार्ग को अपनाया और वर्ष 2004 में इचलकरंजी में आचार्य श्री 108 सन्मतिसागरजी महाराज (दक्षिण) के सान्निध्य में दिगंबर मुनि दीक्षा ग्रहण की।

कठोर तप, उत्कृष्ट संयम और निरंतर साधना के कारण उन्हें 18 फरवरी 2011 को आचार्य पद से विभूषित किया गया। जैन धर्म में यम-सल्लेखना को आत्मशुद्धि, समता और वैराग्य की सर्वोच्च साधनाओं में स्थान प्राप्त है।

यह मृत्यु नहीं, बल्कि देह के प्रति मोह, राग और द्वेष का क्षय कर पूर्ण जागरूकता के साथ आत्मा की ओर अग्रसर होने की आध्यात्मिक प्रक्रिया है।

गुरुवर की यह साधना समाज को आत्मबल, संयम और आत्मकल्याण का संदेश दे रही है। सिद्धक्षेत्र कुंथलगिरी का इतिहास भी अत्यंत गौरवशाली रहा है। यह पवित्र भूमि दिगंबर जैन संतों की तप, त्याग और समाधि की महान परंपरा की साक्षी रही है।

वर्ष 1955 में चरित्र चक्रवर्ती आचार्य श्री 108 शांतिसागरजी महाराज की प्रथम यम-सल्लेखना भी इसी पावन भूमि पर हुई थी और तब से लेकर अब तक यहां 15 से अधिक जैन मुनियों एवं आर्यिकाओं की समाधियां हो चुकी हैं।

इसी कारण कुंथलगिरी को दिगंबर जैन समाज की प्रमुख सिद्ध एवं तपोभूमियों में विशेष स्थान प्राप्त है। आज गुरुवर का क्षीण होता शरीर जहां तप और त्याग की पराकाष्ठा का प्रतीक बन गया है, वहीं उनका अटूट आत्मबल लाखों श्रद्धालुओं के लिए प्रेरणा का स्रोत बना हुआ है।

श्रद्धालुओं की आंखें नम हैं, लेकिन उनके हृदय में गुरुवर की समता साधना के प्रति गहरी श्रद्धा और अनुमोदना का भाव स्पष्ट दिखाई देता है।