महाराष्ट्र जैन वार्ता
पुणे : पुणेके “मिनी शत्रुंजय तीर्थ” के रूप में प्रसिद्ध श्री शत्रुंजय भक्तामर तीर्थ, कोंढवा में आचार्य श्री राजरक्षितसूरिजी, पंन्यास नयरक्षितविजयजी आदि साधु-साध्वीजी की पावन निश्रा में फाल्गुन सुद तेरस पर्व के उपलक्ष्य में भव्य छगाऊ भावयात्रा का आयोजन किया गया।
जो श्रद्धालु शत्रुंजय तीर्थ (पालिताणा) तक नहीं पहुँच सके, वे शत्रुंजय के प्रतीक स्वरूप इस तीर्थ में उपस्थित होकर पाँच चैत्यवंदन तथा छगाऊ की फेरी में शामिल हुए। पुणे के 15 हजार से अधिक श्रद्धालुओं ने भावपूर्वक वंदना कर तीर्थ का लाभ लिया। ट्रस्ट द्वारा विभिन्न प्रकार के स्टॉल लगाकर भोजन-भक्ति की सुंदर व्यवस्था की गई।
आचार्य श्री राजरक्षितसूरिजी ने विशाल सभा को संबोधित करते हुए कहा— “पग चले, वह पदयात्रा; मन जुड़े, वह मानस यात्रा; और आत्मा भीग जाए, वह भावयात्रा कहलाती है।” उन्होंने बताया कि शत्रुंजय तीर्थ का महिमा स्वयं केवलज्ञानी भगवंत भी पूर्ण रूप से वर्णन नहीं कर सकते।
श्री सीमंधर स्वामी भी अपनी देशना में कहते हैं कि शत्रुंजय तीर्थ की तुलना में कोई अन्य तीर्थ नहीं हो सकता। अन्य तीर्थों की अपेक्षा यहाँ की यात्रा का फल सौ गुना अधिक बताया गया है। इस तीर्थ की ओर बढ़ाया गया प्रत्येक कदम करोड़ों भवों के पापों का नाश करता है।
यह तीर्थ शुद्धि, शक्ति और समृद्धि का पावरहाउस है। इसके आलंबन से पापी परमात्मा और भोगी भगवान बने हैं। मान्यता है कि पांडव 20 करोड़ मुनियों के साथ तथा द्रविड़-वारिखिल्लजी 10 करोड़ मुनियों के साथ यहाँ से मोक्ष गए। इसी फाल्गुन सुद तेरस के दिन शांब और पद्मुम्न साढ़े आठ करोड़ मुनियों के साथ भांडवा के डूंगर से मोक्ष गए थे।
पूरी भावयात्रा की व्यवस्था जिनवाणी युवा ग्रुप, पुणे द्वारा संभाली गई। सभी यात्रियों का कुमकुम तिलक कर संघ-पूजन किया गया। यह आयोजन श्रद्धा, भक्ति और आत्मकल्याण की भावना से ओतप्रोत रहा। कार्यक्रम का आयोजन शत्रुंजय मंदिर के अध्यक्ष संजय शहा, ट्रस्टी पारसमलजी लुकंड, सतीश कटारिया, अलकेश लुकंड, विनय शहा और मंदिर के सभी ट्रस्टियों ने किया।

















