महाराष्ट्र जैन वार्ता
पुणे : श्री आदिनाथ सोसायटी जैन संघ, पुणे में आचार्य विमलबोधिसूरी एवं आचार्य राजरक्षितसूरी आदि साधु-साध्वियों की पावन निश्रा में चैत्र मास की नवपद की शाश्वती ओली का प्रारंभ हुआ। अनेक श्रद्धालु भाई-बहनों ने अरिहंत पद की आराधना, पूजा, प्रवचन, प्रतिक्रमण और जाप द्वारा की। संगीत के पवित्र वातावरण में वर्धमान शक्रस्तव के मंत्रोच्चार के साथ परमात्मा का अभिषेक किया गया।
स्टडी सर्कल में आचार्य राजरक्षितसूरीजी ने बताया कि चंचल मन को स्थिर करने के कई साधन हैं, जिनमें सबसे श्रेष्ठ साधन नवपद का ध्यान है। नवपद सभी सुखों का वास्तविक आधार है। अरिहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय, साधु, सम्यग्दर्शन, ज्ञान, चारित्र और तप – ये नौ पद वास्तव में नौ निधियों के समान हैं।
उन्होंने आगे कहा कि जैसे विश्व के संचालन में सूर्य का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है, उससे भी अनंत गुना अधिक महत्व आध्यात्मिक क्षेत्र में अरिहंत परमात्मा का है। सूर्य के बिना जीवन संभव नहीं, उसी प्रकार अरिहंत के बिना सुख, शांति, समाधि और सद्बुद्धि संभव नहीं है। अरिहंत का आत्मा किसी भी भव में हो, उसमें परोपकार की भावना अवश्य होती है।
अरिहंत की प्राप्ति महान करुणा से ही होती है। करुणामूर्ति अरिहंत की पूजा करने वाला स्वयं कठोर कैसे हो सकता है? “मैं और मेरा” का अहंकार करने वाला व्यक्ति अरिहंत की भावना के विपरीत चलता है। धर्म केवल मंदिर, उपाश्रय, मस्जिद या गिरजाघर तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि उसका फल करुणा, क्षमा और उदारता के रूप में हमारे व्यवहार में दिखना चाहिए।
भारतीय संस्कृति में परोपकार की भावना को बढ़ाने के लिए पहले रोटी कुत्ते को देना, पशुओं को घास खिलाना, पक्षियों को दाना डालना और चींटियों को आहार देना जैसी परंपराएँ रही हैं। जैनों में जो उदारता दिखाई देती है, वह अरिहंत परमात्मा की करुणा का ही प्रभाव है।



















