“गुरु एक, रूप अनेक” : गुरु पूर्णिमा के अवसर पर गुरुतत्त्व का प्रेरणादायी संदेश
प. पू. श्री ईशदर्शनाजी म. सा. का प्रेरणादायी प्रवचन : प. पू. डॉ. प्रणवदर्शनाजी म.सा. ने कराया गुरु स्मरण एवं आलोचना
महाराष्ट्र जैन वार्ता
बार्शी : श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ, बार्शी के तत्वावधान में गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर प. पू. डॉ. श्री आचलऋषीजी म. सा., प. पू. डॉ. प्रणवदर्शनाजी म. सा., प. पू. श्री ईशदर्शनाजी म. सा., प. पू. श्री परमदर्शनाजी म. सा. तथा प. पू. श्री राजुलदर्शनाजी म. सा. के पावन सान्निध्य में विशेष प्रवचन एवं “गुरु एक, रूप अनेक” विषय पर सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाएँ, युवक-युवतियाँ एवं बालक-बालिकाएँ उपस्थित रहे।
इस अवसर पर प. पू. श्री ईशदर्शनाजी म. सा. ने गुरु पूर्णिमा के महत्व पर अत्यंत ओजस्वी एवं हृदयस्पर्शी प्रवचन दिया। अपने उद्बोधन में सजग संथारा साधिका प. पू. डॉ. प्रियदर्शनाजी म. सा. से प्राप्त संस्कारों, अध्यात्म की शिक्षा, संयममय जीवन की प्रेरणा तथा उनके सान्निध्य में बिताए गए अनेक प्रेरणादायी प्रसंगों को श्रद्धापूर्वक स्मरण किया।
उन्होंने कहा कि गुरु से प्राप्त संस्कार और शिक्षा ही जीवन की सबसे बड़ी पूँजी है। अपने प्रवचन में उन्होंने उपस्थित श्रद्धालुओं को आत्मचिंतन के लिए प्रेरित करते हुए कहा, “आज प्रत्येक व्यक्ति अपनी आँखें बंद कर अपने गुरु का स्मरण करे और स्वयं से पूछे कि हम अपने गुरु का कितना सम्मान करते हैं, उनकी आज्ञाओं का कितना पालन करते हैं तथा उनके बताए मार्ग पर कितना चल रहे हैं।
केवल गुरु को प्रणाम करना ही पर्याप्त नहीं, बल्कि उनके संस्कारों को अपने जीवन में उतारना ही सच्ची गुरुभक्ति है।” उन्होंने अत्यंत प्रभावशाली उदाहरण देते हुए कहा, “आज हम मोबाइल बदलते हैं, गाड़ी बदलते हैं, फ्लैट बदलते हैं और अनेक भौतिक वस्तुएँ बदलते रहते हैं, लेकिन गुरु नहीं बदला जा सकता।
गुरु जीवन में केवल एक ही होता है। गुरु के प्रति श्रद्धा, विश्वास और समर्पण कभी नहीं बदलना चाहिए। जो अपने गुरु के प्रति अटल निष्ठावान रहता है, वही जीवन में सच्चे अर्थों में धन्य बनता है।”
उनके इन विचारों ने उपस्थित श्रोताओं का मन जीत लिया और पूरा सभागार तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा। आधुनिक तकनीक का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि आज अनेक लोग गूगल, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) तथा विभिन्न डिजिटल माध्यमों से जानकारी प्राप्त करते हैं।
ये साधन जानकारी देने के लिए उपयोगी हो सकते हैं, लेकिन ये जीवन के सच्चे गुरु नहीं बन सकते। सच्चा गुरु केवल जानकारी नहीं देता, बल्कि संस्कार, चरित्र, आत्मज्ञान और मोक्षमार्ग की दिशा प्रदान करता है।
इसलिए तकनीक का विवेकपूर्वक उपयोग करें, किंतु जीवन में गुरु केवल एक ही होना चाहिए। इसके पश्चात प. पू. डॉ. प्रणवदर्शनाजी म. सा. ने सभी श्रद्धालुओं से पाँच मिनट तक अपनी आँखें बंद कर अपने-अपने गुरु का स्मरण करने, उनके श्रीचरणों में मन ही मन नतमस्तक होने तथा आलोचना करने का आह्वान किया।
उनके इस भावपूर्ण संदेश से संपूर्ण सभागार भक्तिमय वातावरण में सराबोर हो गया। संपूर्ण कार्यक्रम में गुरुभक्ति, संस्कार तथा भारतीय एवं जैन गुरु परंपरा के प्रति श्रद्धा का अद्भुत वातावरण देखने को मिला।
युवक-युवतियों की उत्कृष्ट प्रस्तुतियों की उपस्थित जनसमूह से हर्ष हर्ष की गुंज उठी ती गुरु पूर्णिमा के इस विशेष आयोजन के माध्यम से “गुरु एक होता है, किंतु उसके संस्कार, ज्ञान और प्रेरणा के स्वरूप अनेक होते हैं” यह अमूल्य संदेश सभी तक पहुँचा।
गुरुतत्त्व, गुरुभक्ति और संस्कारों के महत्व को उजागर करने वाला यह आयोजन बार्शी जैन समाज के लिए प्रेरणादायी, संस्कारमय एवं अविस्मरणीय सिद्ध हुआ।
“गुरु एक, रूप अनेक” विषय पर आधारित सांस्कृतिक कार्यक्रम का प्रभावी प्रस्तुतीकरण नीता तातेड एवं निकिता सुराणा ने किया। कार्यक्रम के समापन पर श्री संघ की ओर से ऐतिहासिक वेशभूषा प्रस्तुत करने वाले सभी बालक-बालिकाओं एवं युवक-युवतियों को शाबाशीपूर्वक भेंटवस्तुएँ प्रदान कर उनके उत्कृष्ट प्रयासों की सराहना की गई।
इसके पश्चात बार्शी जैन संघ के युवक-युवती कलाकारों ने “गुरु एक, रूप अनेक” विषय पर आधारित ऐतिहासिक वेशभूषा प्रस्तुत की। जिजाऊ माता – पलक दुगड, छत्रपति शिवाजी महाराज – राज कुंकूलोळ, सावित्रीबाई फुले – मोसमी कांकरिया, महात्मा ज्योतिबा फुले – यश कांकरिया, शय्यंभवाचार्य – भक्ति धाडीवाल, मनकमुनि – अक्षरा श्रीश्रीमाळ, हेमचंद्राचार्य – साक्षी भंडारी, कुमारपाल राजा – पलक कुंकूलोळ, स्वामी विवेकानंद – उन्नति कांकरिया तथा परमहंस – स्मितल कुंकूलोळ ने विभिन्न गुरुजनों, महापुरुषों एवं प्रेरणादायी व्यक्तित्वों का प्रभावशाली अभिनय और आकर्षक वेशभूषा के माध्यम से सजीव चित्रण किया। प्रत्येक प्रस्तुति के माध्यम से गुरु के संस्कार, त्याग, ज्ञान, राष्ट्रप्रेम, समाजजागरण और धर्मप्रभावना का प्रेरक संदेश दिया गया।
