महाराष्ट्र जैन वार्ता
पुणे : संस्कार हमारे भीतर परिवर्तन लाते हैं, ऐसा प्रतिपादन प. पू. प्रवीणऋषिजी म.सा. ने किया। वे परिवर्तन चातुर्मास 2025 के अंतर्गत आयोजित प्रवचनमाला में बोल रहे थे। प. पू. प्रवीणऋषिजी म.सा. ने कहा, “मान लीजिए आपको अपार वैभव प्राप्त हुआ है, संसार भी आपने अच्छे ढंग से, सफलतापूर्वक संभाला है। यह सब होते हुए भी, कई बार हम बच्चों को संस्कार देने में असफल रहते हैं। माता-पिता अपने बेटे-बेटियों को पूरी आस्था और विश्वास से पढ़ाई के लिए, उनके विकास के लिए बाहर भेजते हैं। लेकिन यही बच्चे किसी न किसी प्रलोभन के कारण गलत राह पकड़ लेते हैं। जब बच्चों पर रखा गया विश्वास टूटता है, तब माता-पिता के पास आंसू बहाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता।
अगर हम इस बात को खुली आंखों से देखें, तो यह समझ में आता है कि क्या हम सचमुच सजग पालक हैं? क्या हमने उन्हें संस्कार देने में कहीं चूक की है? उनके मासूम उम्र में ही हमें उनके मन पर भगवान, धर्म और गुरु के प्रति संस्कार अंकित करने चाहिए थे।
संस्कारों का महत्व समझाते हुए प. पू. प्रवीणऋषिजी म.सा. ने कहा, “यदि आज आप सभी प्रवचन सुनने के लिए उपस्थित हुए हैं, तो इसका कारण आपके भीतर मौजूद संस्कार ही हैं। अगर वे संस्कार न होते, तो शायद आप आज यहां न होते।
अक्सर हमारे आचरण और बोलचाल से यह स्पष्ट हो जाता है कि हमारे ऊपर कैसे संस्कार हुए हैं। अपना और अपने परिवार का व्यवहार ऐसा होना चाहिए कि दूसरों को देखकर हमारे धर्म के प्रति आकर्षण पैदा हो। धर्म के प्रति वह अग्नि आपके हृदय में प्रज्वलित होनी चाहिए।
यदि आपके मन में यह अग्नि जल उठी, तो इस महोत्सव को तन-मन-धन से सफल बनाने वाले संघ, समिति और व्यक्तियों को यह प्रयास सार्थक और कृतार्थ लगेगा। हम आज गुरुदेव आनंदऋषिजी द्वारा दिए गए मूल्यों को जागृत करने के लिए एकत्र हुए हैं। गुरुदेव के जन्मदिवस के इस पावन अवसर पर यहां से लौटते समय एक संकल्प लेकर जाएं मंगल पाठ और प्रतिगमन का।
अपने मन में यह ठान लें कि “मेरे बच्चे को अगर और कुछ न भी आए, तो ये दो बातें जरूर आनी चाहिए।” आज यहां से लौटने वाला हर व्यक्ति गुरुदेव के जीवन मूल्यों और विचारों की सुगंध अपने साथ लेकर लौटे ऐसी आशा मेरे मन में उत्पन्न हुई है।















