महाराष्ट्र जैन वार्ता
पुणे : जीवन की सच्ची धन्यता कहाँ निहित है? वह दूसरों को कुछ देने, उन्हें आनंदित करने और उनके चेहरे पर मुस्कान लाने में ही है। ऐसा भावपूर्ण संदेश प. पू. प्रवीणऋषिजी म.सा. ने परिवर्तन चातुर्मास 2025 के अंतर्गत आयोजित प्रवचनमाला में व्यक्त किया।
प. पू. प्रवीणऋषिजी म. सा. ने कहा कि प्रत्येक जीव इस संसार में जन्म लेकर जीवन व्यतीत करता है, परंतु यह चिंतन आवश्यक है कि हम अपने जीवन को किस प्रकार श्रेष्ठ, सार्थक और सुसंस्कृत बना सकते हैं।
केवल स्वयं के आनंद और सुख को जीवन का लक्ष्य मान लेना उचित नहीं है। हमें यह देखना चाहिए कि हमारा जीवन समाज के लिए कितना उपयोगी, प्रेरणादायक और पुण्यमय बन सकता है। उन्होंने कहा कि मोक्ष के मार्ग पर आगे बढ़ने का पहला द्वार दान है। यह एक महान संस्कार है, जो साधारण व्यक्ति में भी दिव्यता उत्पन्न करने की क्षमता रखता है।
दान देना केवल एक क्रिया नहीं, बल्कि एक पुण्यकर्म है। यदि किसी का चरित्र परिवर्तन करना हो, तो उसकी शुरुआत भी दान से ही होती है। जब कोई पुण्यकर्म करता है और उसमें समाज का सहयोग मिलता है, तभी समाज की नींव मजबूत होती है और यहीं से समाज का निर्माण आरंभ होता है।
उन्होंने कहा – “जो दुखियों को अपना समझे, वही सच्चा साधु है; वही ईश्वर का साक्षात् रूप है।” इस वाक्य के अनुसार समाज के दुःख को समझना और उसके प्रति संवेदनशील होना आवश्यक है। समाज में पीड़ितों के आँसू पोंछने और उनकी सहायता के लिए हमारे जैसे कई हाथ तैयार रहने चाहिए।
आगे उन्होंने कहा कि जीवन के तीन मूल स्तंभ हैं – धर्म, कर्म और रिश्ते। धर्म आत्मा से जुड़ा होता है, कर्म आत्मा को रूप देता है, और रिश्ते दूसरों से जुड़ाव से बनते हैं। लेकिन यदि रिश्तों में परिपक्वता न हो, तो महाभारत जैसी विघटनकारी घटनाएं घट सकती हैं।
इन तीनों तत्वों को संभालने के लिए तीन सूत्र या मंत्र आवश्यक हैं – करना, करवाना और व्यवस्था बनाना।
पहला मंत्र – “करना”: इसमें दान देना, ध्यान करना और जप करना शामिल है। इन क्रियाओं से व्यक्ति स्वयं को शुद्ध करता है, सुसंस्कारित करता है और पुण्य अर्जित करता है।
दूसरा मंत्र -“करवाना”: इसमें दूसरों से पुण्यकर्म करवाना शामिल है। जैसे माता-पिता अपने बच्चों को अच्छे संस्कार देते हैं और उनके माध्यम से सत्कर्म कराते हैं। इससे बच्चों को उचित दिशा मिलती है, अन्यथा उनका चरित्र विकास कैसे होगा?
तीसरा मंत्र – “व्यवस्था बनाना”: जब एक सज्जन व्यक्ति समाज में सक्रिय होता है, तो वह यह सोचता है कि मेरे समाज और देश की व्यवस्था श्रेष्ठ कैसे हो। इस व्यवस्था के निर्माण में सहयोग की आवश्यकता होती है, जो सामूहिक प्रयास से ही संभव है। यही सामूहिकता समाज, राष्ट्र और अंततः सम्पूर्ण विश्व की रचना का आधार बनती है।
अतः समाज के निर्माण हेतु हम सभी को एकजुट होकर कार्य करना चाहिए। इसके लिए दान के महत्व को पहचानना और सामूहिक रूप से आगे आना अत्यंत आवश्यक है। यदि यह दान भक्ति-भाव से किया गया हो, तो वह निश्चित ही भविष्य में वरदान सिद्ध होता है

















