महाराष्ट्र जैन वार्ता
पुणे : भूतकाल का कोई भी प्रभाव हम पर नहीं पड़ना चाहिए। जब तक हम स्मृतियों के प्रभाव में रहते हैं, तब तक हमारा भविष्य उसी के अधीन रहता है। इसलिए केवल विस्मरण (भूल जाना) पर्याप्त नहीं है, बल्कि हमें स्मृतियों का विसर्जन करना होगा। भविष्य की एक स्पष्ट छवि हमारे मन में बननी चाहिए और उस छवि से दृढ़तापूर्वक जुड़ना आवश्यक है, ऐसा प्रतिपादन प. पू. प्रवीणऋषिजी म. सा. ने किया।
प. पू. प्रवीणऋषिजी म. सा. ने कहा कि जैन धर्म ने हमारे सामने सिद्ध होने और मुक्त होने का मार्ग प्रस्तुत किया है। जन्म–मृत्यु के इस चक्र से बाहर निकलने के लिए जैन धर्म पथप्रदर्शक है। अंतगड सूत्र की प्रेरणा केवल हमारे मन में स्पष्ट होना आवश्यक है।
प्रत्येक व्यक्ति की परिस्थिति अलग-अलग होती है, लेकिन प्रत्येक को इस संसार से मुक्त होना है। अंतगड सूत्र की सर्वोच्च संकल्पना यही है कि आपका भूतकाल चाहे जैसा भी रहा हो, आप अपना भविष्य स्वयं बना सकते हैं।
जहाँ से भी आप शुरुआत करेंगे, वहीं से आपका नया सफ़र प्रारंभ होता है। जब हमें भविष्य की अपनी छवि बनानी हो, तब इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि हमारी आंतरिक ऊर्जा का प्रवाह कहीं और भटक न जाए।
यदि हमें कोई मूर्ति बनानी है, लेकिन उसका साँचा ही तैयार नहीं किया गया, तो क्या अच्छी मूर्ति बन पाएगी? यह बात ध्यान में रखना आवश्यक है। हम सबके भीतर शक्ति समान रूप से विद्यमान है, लेकिन उस शक्ति का एकाग्र होकर सही स्थान पर उपयोग कैसे करना है, यही हमें भूल गया है।
यह गहराई से सोचना आवश्यक है कि जैसा हम चाहते हैं वैसा अपना भविष्य क्यों नहीं बना पा रहे हैं।
