महाराष्ट्र जैन वार्ता
पुणे : नई पीढ़ी अब केवल परंपराओं से बंधकर रहने के बजाय धर्म को जानने और समझने के लिए तैयार हो गई है। इसलिए जैन धर्म का एक वैश्विक रूप जग के सामने आना आवश्यक है, ऐसा प्रतिपादन प. पु. प्रवीणऋषिजी म. सा. ने किया।
उन्होंने कहा कि जैसे मुस्लिम, ईसाई और सिख धर्म के लोगों की अपनी अलग पहचान है, वैसे ही जैन धर्मियों की भी एक स्वतंत्र पहचान होनी चाहिए। इसके लिए व्यक्तिगत, पारिवारिक और सामाजिक स्तर पर कम से कम कुछ संकेत स्थापित किए जाने चाहिए। इस प्रकार जैन समाज की एक स्वतंत्र आचारसंहिता तैयार होनी चाहिए।
प. पु. प्रवीणऋषिजी म. सा. ने कहा, क्षमा का अर्थ केवल सहन करना नहीं है और न ही अपराध को भूल जाना है। सच्ची क्षमा अपराधी व्यक्ति को भी सिद्ध बना देती है। वास्तविक क्षमा वही है जो महावीर की है, जिसने चंडकोषी जैसे अपराधी को भी भीतर और बाहर से बदल दिया। धर्म का अर्थ है परिवर्तन।
कर्म बदलना हमारे हाथ में है। यदि रिश्ते बदलने हैं तो यह क्षमा के माध्यम से संभव है। जीवन में सबसे अधिक सुख और दुख रिश्तों से ही मिलता है। यदि मन में क्षमा का भाव है तो कर्मक्षय करना संभव हो जाता है।
धर्म के मार्ग पर चलना सरल हो जाता है। रिश्तों में मधुरता, सौहार्द, समझदारी और प्रेम बढ़ने लगता है। लेकिन जब परंपरा प्रमुख हो जाती है और धर्म गौण हो जाता है, तब रिश्तों में कटुता आ जाती है।
जैसे-जैसे आप ऊँचे पद पर पहुँचते हैं, वैसे-वैसे आपके प्रति अपेक्षाएँ भी बढ़ती जाती हैं। भगवान महावीर ने कहा है कि क्षमापना पूरे संसार को समझनी चाहिए। आज की नई पीढ़ी केवल परंपरा से बंधकर रहने के बजाय नया धर्म समझने के लिए तैयार है।
इसलिए जैन धर्म का बदला हुआ स्वरूप दुनिया के सामने आना ज़रूरी है। लगभग 90 प्रतिशत लोग चाहते हैं कि जैन एक हों, केवल 1 प्रतिशत ही ऐसे हैं जो अपनी परंपराओं को पकड़े रहना चाहते हैं।
अब समय आ गया है कि जैन समाज एकजुट हो और विश्व में अपनी नई पहचान स्थापित करे।
