आवृत्ती , पुणे
← Back to Homepage

जैसा खाओगे, वैसे बनोगे : प. पू. प्रवीणऋषिजी म. सा.

Spread the love

पुणे : हम जैसा भोजन करते हैं, वैसा ही हमारा मन भी बनता है। जिस प्रकार के गुण भोजन में होते हैं, वही गुण हमारे व्यक्तित्व में उतरते हैं। हमारे स्वास्थ्य, विचारों और व्यवहार पर उसका सीधा प्रभाव पड़ता है। आप जैसे प्रकार का भोजन खाएँगे, वैसे ही बनते जाएँगे, ऐसा प्रतिपादन प. पू. प्रवीण ऋषिजी म. सा. ने किया। परिवर्तन चातुर्मास 2025 के अंतर्गत आयोजित प्रवचन माला में वे बोल रहे थे।

प. पू. प्रवीणऋषिजी म.सा. ने कहा आहार केवल पेट भरने के लिए नहीं होता, बल्कि यह शरीर, मन और आत्मा को पोषण देने वाला ऊर्जा का स्रोत होता है। भूख सबसे बड़ी बीमारी और सबसे बड़ा कष्ट है। भूख केवल शरीर की नहीं होती, बल्कि यह मन की, वासना की भी होती है। इसी प्रकार पीड़ा भी केवल शारीरिक नहीं होती, बल्कि मानसिक भी होती है।

इसलिए जब हमें भूख लगे तो हम कब और कैसे खाते हैं, इसका बहुत महत्व है। यदि केवल पेट भरना ही उद्देश्य होगा, तो बस पेट भर जाएगा, परंतु उत्तम स्वास्थ्य और निरोगी तन-मन प्राप्त नहीं होगा।

केवल पेट भरने से भूख वास्तव में शांत नहीं होती। “उदरभरण नोहे जाणिजे यज्ञकर्म”, भूख शांत करना एक प्रकार से यज्ञकर्म के समान है। यदि हम यह समझ लें, तो आहार के प्रति हमारा दृष्टिकोण अवश्य बदल जाएगा। भूख की पीड़ा शांत करना ही हमारा पहला लक्ष्य होना चाहिए।

प. पू. प्रवीणऋषिजी म. सा. ने कहा, तनाव में खाया गया भोजन शरीर को उचित पोषण नहीं दे सकता। लेकिन वही भोजन यदि शुद्ध भावना और सात्त्विकता से खाया जाए, तो शरीर स्वस्थ रहता है, मन शांत होता है और विचारों में स्पष्टता आती है। भोजन करते समय मन में कौन-सी भावना है, यह देखना आवश्यक है।

‘मैं पेट के लिए खा रहा हूँ’ या ‘शरीर का पोषण हो इसलिए खा रहा हूँ, ऐसा कभी मत कहिए। यह केवल खाने के बाद की अनुभूति है, और इसी कारण ऐसी प्रतिक्रियाएँ उत्पन्न होती हैं। शरीर के लिए खाना यह भाव बदलना होगा।

भोजन करने के भी चार प्रकार बताए गए हैं, चरना, भक्षण करना, भोजन करना और प्रसाद ग्रहण करना। हमें यह देखना चाहिए कि हम इन चार प्रकारों में कहाँ आते हैं। इसलिए आहार सजगता से, उचित पद्धति से और सही भावना से लेना चाहिए।

सामने आया भोजन प्रसाद मानकर, उसी भक्ति और श्रद्धा से ग्रहण करना चाहिए। भोजन जितनी श्रद्धा और भक्ति से करेंगे, उतना ही आदरभाव थाली में परोसे गए भोजन के प्रति होना चाहिए। थाली में आधा खाया हुआ या बचा हुआ भोजन फेंकना, एक प्रकार से भोजन और अन्नपूर्णा का अपमान है।

इसलिए भोजन करते समय मन में कृतज्ञता की भावना होनी चाहिए। भोजन हमारे तक पहुँचाने में अनेक हाथों की मेहनत होती है, इसका विचार कर आदर और कृतज्ञता से भोजन करने पर उसकी सकारात्मक ऊर्जा बढ़ती है। ऐसा सजग और सही पद्धति से लिया गया आहार न केवल स्वास्थ्य सुधारता है, बल्कि हमारे जीवन में आनंद, शांति और संतुलन भी लाता है।