आवृत्ती , पुणे
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संस्कृति ही देश की असली पहचान : प. पू. प्रवीणऋषीजी म. सा.

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पुणे : स्वाधीनता मिली, राजनीतिक स्वतंत्रता मिली, सत्ता भी मिली, लेकिन क्या सांस्कृतिक स्वतंत्रता मिली? संस्कृति हमारे देश की रीढ़ है। विविधताओं से सुसज्जित हमारे राष्ट्र की संस्कृति ही उसकी सच्ची पहचान है, ऐसा प्रतिपादन प. पू. प्रवीणऋषीजी म. सा. ने किया।

प. पू. प्रवीणऋषीजी म. सा. ने कहा, हमारे राष्ट्र की आत्मा ही संस्कृति है। हर इमारत से लेकर हर वस्तु तक असंख्य चीज़ें संस्कृति से ओत-प्रोत हैं। लेकिन यह संस्कृति आज कहीं न कहीं खोती जा रही है, उसका ह्रास हो रहा है। ढहती हुई संस्कृति में परिवर्तन लाना बेहद ज़रूरी है। इस पर विचार कर अब प्रत्यक्ष कार्यवाही करने का समय आ गया है।

विदेशी संस्कृतियों का अंधानुकरण करके हम स्वयं अपनी संस्कृति का ह्रास कर रहे हैं। यह बात जानते हुए भी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से हम ही इस बदलती संस्कृति को अनुमति दे रहे हैं। बदलते हालात की जागरूकता होने के बावजूद इसके खिलाफ बोलने वाला कौन? पहला स्वर उठाने वाला कौन? हम सिर्फ सोचते रह जाते हैं। जब तक शुरुआत हम स्वयं से नहीं करते, तब तक संस्कृति का ह्रास निश्चित है।

प. पू. प्रवीणऋषीजी म. सा. ने कहा, बदलती संस्कृति के विरुद्ध कदम उठाने से हम डरते हैं, क्योंकि हमारे पास न तो दंड देने का, न बदलाव रोकने का और न ही उचित समझ देने का कोई अधिकार है। इसी स्थिति से यह अराजकता फैल रही है। वास्तव में आज के स्वतंत्रता दिवस पर प्रत्येक व्यक्ति को मन में संस्कृति की स्वतंत्रता का आंदोलन खड़ा करना चाहिए।

ढह चुकी संस्कृति को पुनः स्थापित करने का दृढ़ संकल्प लेना होगा। संस्कृति को बचाया, तो धर्म का विकास होगा, अन्यथा अधर्म फैल जाएगा। इसके लिए एक सुनियोजित और सुसज्जित व्यवस्था का निर्माण आवश्यक है। कोई भी आंदोलन या व्यवस्था एक दिन में नहीं बनती; इसके लिए सभी को मिलकर निरंतर प्रयास करना पड़ता है।

संस्कृति की नींव केवल बाहरी वस्तुओं में नहीं, बल्कि प्रत्येक के मन और विचारधारा में होनी चाहिए। इसकी शुरुआत खुद से करना जरूरी है। हमारी इंसानियत कहीं खो रही है, हम अंधानुकरण के पीछे भाग रहे हैं, और इस कारण अपने पास की संस्कृति का अमूल्य खज़ाना छोड़ रहे हैं।

इसके लिए संस्कार आवश्यक हैं। संस्कारों से दूरी का मतलब है संस्कृति से दूरी। इसलिए आने वाली पीढ़ी में संस्कारों के साथ संस्कृति का बीज बोना आवश्यक है। लोकपरंपरा, भाषा, कला और विरासत को संजोना, संस्कृति को बचाने का एक सुनिश्चित मार्ग है। अतः संस्कृति को बचाना यानी स्वयं को बचाना है—यह बात हमें सदैव याद रखनी चाहिए।