महाराष्ट्र जैन वार्ता
पुणे : हर धर्म में क्षमा को महत्त्व दिया गया है, परंतु जैन परंपरा में इसे एक उत्सव के रूप में मनाया जाता है। संवत्सरी… जिसे “क्षमापना दिवस” भी कहा जाता है, यह जैन समाज का सबसे पवित्र दिन माना जाता है। यह दिन केवल धार्मिक अनुष्ठानों का नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि, आत्मचिंतन और रिश्तों को नई ऊर्जा देने का अवसर है।
संवत्सरी क्यों मनाई जाती है? – जैन परंपरा के अनुसार, पर्युषण महापर्व का अंतिम दिन संवत्सरी कहलाता है। हम वर्षभर में जाने-अनजाने कई लोगों को कभी वाणी से, कभी आचरण से, तो कभी विचारों से आहत करते हैं। ये नकारात्मक भाव हमारे मन में तनाव और कटुता उत्पन्न करते हैं। संवत्सरी का दिन हमें यह स्वीकार करने का अवसर देता है कि “हाँ, मुझसे गलती हुई है, मैं दिल से क्षमा मांगता हूँ।” इस प्रकार हम अपने अपराधबोध को व्यक्त करते हैं और सामने वाले से क्षमा याचना करते हैं।
क्षमायाचना का वास्तविक अर्थ – क्षमायाचना केवल औपचारिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि आत्मा की गहराई से निकलने वाली भावना है। यह हमें अहंकार से मुक्त करती है। यह रिश्तों की दीवारों को गिराकर प्रेम और विश्वास का नया सेतु निर्मित करती है। यह याद दिलाती है कि गलती करना मनुष्य का स्वभाव है, लेकिन उसे स्वीकार कर सुधारने की प्रवृत्ति ही सच्ची मानवता है। जैन आगमों में कहा गया है कि क्षमा माँगने वाला और क्षमा करने वाला – दोनों ही निर्भार हो जाते हैं। एक को अपराधबोध से मुक्ति मिलती है और दूसरे के हृदय से कटुता समाप्त हो जाती है। यही कारण है कि इस दिन का विशेष महत्त्व है।
आज के समय में आवश्यकता – आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में रिश्ते बहुत छोटी-छोटी बातों पर टूटने लगे हैं। कोई संदेश का उत्तर न दे, तो लोग नाराज़ हो जाते हैं, दूरी बना लेते हैं। ऐसे समय में क्षमापना दिवस हमें रुककर सोचने की प्रेरणा देता है कि – “क्या यह गलती इतनी बड़ी है कि मैं अपना रिश्ता ही खो दूँ?” यदि हम साल में केवल एक बार भी सच्चे मन से क्षमा माँग लें और दूसरों को क्षमा कर दें, तो न केवल घर का वातावरण, बल्कि संपूर्ण समाज का वातावरण सकारात्मक हो सकता है।
संवत्सरी पर्व हमें सिखाता है कि रिश्ते अहंकार पर नहीं, बल्कि विश्वास और क्षमापना पर टिकते हैं। क्षमा माँगना कमजोरी का प्रतीक नहीं है, बल्कि यह सबसे बड़ी ताकत है। जब मैं दूसरों को क्षमा करता हूँ, तो मैं स्वयं को भी मुक्त कर लेता हूँ। “दुनिया के कई धर्म क्षमा का उपदेश देते हैं, लेकिन क्षमा को पर्व के रूप में मनाने का सौभाग्य केवल जैन धर्म को ही प्राप्त हुआ है।” इसे सदा याद रखना चाहिए। – प. पू. प्रवीणऋषिजी म. सा.
