महाराष्ट्र जैन वार्ता
पुणे : ज्ञान, दर्शन, चरित्र और तप इन चारों का जहाँ संगम होता है, वहीं मोक्ष का मार्ग होता है। जहाँ ज्ञान अलग, भावनाएँ अलग, आचरण अलग और व्यवहार अलग होता है, वहाँ मोक्ष नहीं, बल्कि बंधन होता है। जब हमारी सभी प्रवृत्तियाँ एक दिशा और एक मार्ग पर चलती हैं, तभी उसे मोक्षमार्ग पर चलना कहा जाता है।
जैन साधना-पद्धति को सही रूप से समझना आवश्यक है। जिसने 28वाँ अध्याय समझ लिया, उसने जैन धर्म को समझ लिया। अपनी बुद्धि से जो है उसे जानना महत्वपूर्ण है — उसे ही ज्ञान कहा जाता है। जब हम जो है उसे जान लेते हैं, तब चिंतन आरंभ होता है; परंतु जो नहीं है, उसे जानने की जिद में फँस जाते हैं, तब चिंता आरंभ होती है। यह सूक्ष्म अंतर समझना आवश्यक है।
जो जाना है, उसका श्रद्धापूर्वक स्वीकार करें। जो है, उसका साक्षात्कार ज्ञान से होता है; और जो हो सकता है, उसके लिए श्रद्धा आवश्यक है। भीतर जो ऐश्वर्य है, उसे ठीक प्रकार से समझ लेना ही श्रद्धा कहलाती है।
चरित्र के माध्यम से हमारा प्रवास तप-साधना की ओर होता है। अक्सर जहाँ हमें पहुँचना होता है, वहाँ तक पहुँचने के लिए हमें अपने कम्फर्ट ज़ोन से बाहर निकलना पड़ता है। जब हम कम्फर्ट ज़ोन से बाहर निकलते हैं, तभी वह सबसे सुंदर तप बन जाता है। हमारे धर्म ने हमें ‘सुखी भव’ का आशीर्वाद तो दिया है, परंतु ‘समर्थ भव’ का नहीं। जब हम समर्थ बनेंगे, तब अपने आप सुखी हो जाएँगे।
कुल 72 प्रकार की साधनाएँ बताई गई हैं, जिनमें क्रीयाकांड का कोई दिखावा नहीं है। उनका शास्त्रीय आधार है। जिस परिस्थिति में आप हैं, उसका कारण क्या है। यह देखने की आवश्यकता है। यही समझ आपके जीवन में आमूलचूल परिवर्तन ला सकती है।
यह अध्याय वास्तव में अध्यात्म का विज्ञान है। इसे भलीभाँति समझना चाहिए। केवल अंधानुकरण नहीं। मोक्षप्राप्ति के लिए हमारे मन में और भीतर से तीव्र तड़प जागनी चाहिए। उसी तड़प से जो जन्म लेता है, वही धर्म-श्रद्धा कहलाती है। यह तड़प हमारे रोम-रोम से जागृत होनी चाहिए।















