आत्मा ही मूल केंद्र है : प. पू. प्रवीणऋषिजी म. सा.
महाराष्ट्र जैन वार्ता पुणे : तप का अर्थ है साधना द्वारा अपने भीतर जागृत की गई ज्योति। बाहरी तप दिखाई देता है, परंतु आंतरिक तप दृष्टिगोचर नहीं होता। इसलिए प्रश्न उठता है कि यह तप की ज्योति कहाँ और कैसे प्रज्वलित होनी चाहिए? इसका उत्तर देते हुए प. पू. प्रवीणऋषिजी ने कहा – जब तप … Read more