सुख की परिभाषा बदलें : प. पू. प्रवीणऋषिजी म. सा.
महाराष्ट्र जैन वार्ता पुणे : किसी व्यक्ति के पास सभी सुख-सुविधाएँ, समृद्धि, ऐशोआराम और वैभव हो सकता है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि वह भीतर से सचमुच सुखी है। सुख बाहरी वस्तुओं से प्राप्त होने के बजाय आपके अंतर्मन में होना चाहिए। सुख की परिभाषा जैसी परिस्थिति के अनुसार बदलती रहती है, वैसे ही … Read more