श्रेष्ठत्व की भावना को समझें: प. पू. प्रवीणऋषिजी म. सा.
महाराष्ट्र जैन वार्ता पुणे : जो उत्तम है, श्रेष्ठ है, उसका बोध हमें होना आवश्यक है। जिसे हम श्रेष्ठ मानते हैं, उत्तम मानते हैं, उसी के अनुसार हमारा भविष्य निर्मित होता है। यूं ही किसी को श्रेष्ठ मानने से नहीं, बल्कि जब तक उस श्रेष्ठत्व की भावना हमारे तन-मन में उत्पन्न नहीं होती, तब तक … Read more