आवृत्ती , पुणे
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संपत्ति साध्य नहीं, बल्कि साधन है” – प. पू. प्रवीणऋषिजी म. सा.

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परमात्मा ने कहा है कि परिग्रह (संपत्ति का संग्रह) पाँचवाँ पाप है। हम परिग्रह को हमेशा धन और संपत्ति के रूप में देखते हैं, इसीलिए उससे मुक्त होने की इच्छा भी नहीं होती। जितना अधिक व्यक्ति इसमें उलझता है, उतना ही अधिक पाप उसके साथ जुड़ता जाता है। लेकिन जो व्यक्ति इस मोह से मुक्त होता है, वही सच्चे अर्थों में स्वतंत्र होता है। हमें यह बात हमेशा स्मरण में रखनी चाहिए कि धन और संपत्ति कोई साध्य (लक्ष्य) नहीं, बल्कि केवल साधन है। यही संदेश प. पू. प्रवीणऋषिजी म. सा. ने आज ‘परिवर्तन 2025’ चातुर्मास के पहले प्रवचन में दिया। उन्होंने परिग्रह, परिवार और शरीर – इन तीनों के मोह और आसक्ति से मुक्त होने की आवश्यकता पर विस्तृत, गहन और जीवनदर्शी मार्गदर्शन दिया।

प. पू. प्रवीणऋषिजी म. सा. ने कहा, जिनके पास ये तीन मनोरथ (आत्मिक संकल्प) होते हैं, वे वास्तव में संसार के सबसे धनी व्यक्ति होते हैं। और जिनके पास यह नहीं होता, वे संसार के सबसे दरिद्र माने जाते हैं।

स्वप्न देखना मनुष्य का स्वभाव है, लेकिन अनादिकाल की वासनाओं और मोहनीय कर्मों के कारण हम स्वप्नों में ही जीते रहते हैं। यदि हमें अपने जीवन को सही दिशा देनी है, तो पहले उन स्वप्नों की दिशा बदलनी होगी।

मन का रथ – मन, जन और धन के चारों ओर ही घूमता है। जब यह दिशा बदलेगी तभी लक्ष्य भी बदलेगा। और इसके लिए मन को प्रशिक्षित करना आवश्यक है।