महाराष्ट्र जैन वार्ता
पुणे : हमारा मन अपार ऊर्जा का स्रोत है। मन का स्वरूप भले ही निराकार है, लेकिन उसका स्वभाव चंचल है। इस चंचलता के कारण वह कभी यहाँ तो कभी वहाँ भटकता रहता है। हमारे मन में अनेक शुभ-अशुभ विचारों की धाराएँ बहती रहती हैं और भीतर तक असर करती हैं। इसलिए हमारा मन, वचन और शरीर हमेशा शुभ ही हों, यह आवश्यक नहीं। कभी-कभी उन पर अशुभ का प्रभाव भी पड़ सकता है।
यदि मन में लगातार शुभ विचारों की पेरणी करते रहें, तो शुभ विचार ही अंकुरित होंगे। अर्थात मन को शुभ बनाएँगे, तो उसके परिणाम भी शुभ होंगे। इस प्रकार मन का निर्माण करना चाहिए। जब हमें कोई लक्ष्य प्राप्त करना हो, तो उसके लिए मन में उस लक्ष्य का निर्मल ध्यास होना बहुत आवश्यक है।
मन ने कोई स्वप्न देखा और फिर उसे छोड़ दिया, ऐसा न हो, बल्कि उस स्वप्न को पूरा करने के लिए निरंतर प्रयासरत रहना चाहिए। तब वह स्वप्न अवश्य पूर्ण होगा। इसके लिए हमारी श्रद्धा और विश्वास दृढ़ होना चाहिए।
यह ध्यास हमारे मन-प्राण में, तन-मन में रच-बस जाना चाहिए। केवल किसी के कहने पर कोई काम करने से परिणाम नहीं मिलता, जब तक वह ध्यास हमारे अंदर से न जागे। जब मन में ऐसी प्रबल ओढ़ जागृत हो जाती है, तब चाहे कितनी भी कठिनाइयाँ, बाधाएँ या संकट सामने आएँ, हमें हार नहीं माननी चाहिए और अपने लक्ष्य तक पहुँचने की उर्मी बनाए रखनी चाहिए।
लेकिन यह ध्यास, उर्मी और ओढ़ तभी जागृत होगी, जब आपका मन स्वस्थ और शुद्ध होगा। इसके लिए मन, वचन और शरीर को संपन्न होने दें। हमारा आत्मा तो पहले से ही निर्मल है, उसमें शुद्ध विचारों की वृद्धि होगी, तो यह निराकार मन को शुभ विचारों से आकार देने का प्रयास अवश्य करेगा।















