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रामायण आर्यावर्त के सभी धर्मों में सर्वाधिक पूजनीय – पं. राजरक्षितविजयजी

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मुंबई : श्री आदिनाथ चौमुख जिनालय, स्वप्न नगरी जैन संघ, मुलुंड (वे.) में पं. राजरक्षितविजयजी ने प्रवचन देते हुए कहा कि रामायण केवल एक ग्रंथ नहीं, बल्कि जीवन को सही दिशा देने वाला पथप्रदर्शक है। उन्होंने बताया कि कलिकाल सर्वज्ञ आचार्य हेमचंद्रसूरिजी महाराज ने ‘त्रिषष्ठी शलाका पुरुष’ ग्रंथ में रामायण का विस्तार से वर्णन किया है। रामायण आर्यावर्त के सभी धर्मों में पूजनीय है और इसे अत्यधिक सम्मान प्राप्त है।

पं. राजरक्षितविजयजी ने कहा कि रामायण का प्रभाव इतना गहरा है कि यह युवा, वृद्ध, विद्वान, अनपढ़, गरीब और अमीर – सभी को समान रूप से आकर्षित करता है। इस पवित्र ग्रंथ ने न जाने कितने पतित लोगों को परमेश्वर बना दिया और नराधमों को नारायण बना दिया।

उन्होंने वाल्मीकि ऋषि का उदाहरण देते हुए कहा कि पहले वे वालिया डाकू थे, लेकिन श्रीराम के नाम का जाप करने से उनके पाप नष्ट हो गए और वे महाकवि बन गए। इसी प्रकार, रामायण एक पारसमणि की तरह है, जो लोहे को सोने में बदलने की शक्ति रखती है।

उन्होंने कहा कि रामायण मात्र एक कथा नहीं, बल्कि आचरण का विषय है। इसमें प्रत्येक पात्र के भीतर महान गुण समाहित हैं – लक्ष्मण का भ्रातृ प्रेम, सीता की पतिभक्ति, दशरथ की सज्जनता, भरत की अनाशक्ति, हनुमान का बल-भक्ति और विभीषण की नैतिकता सर्वोच्च कोटि की है।

कैकेयी की प्रतिज्ञा निभाने की दृढ़ता और रावण का अटल निश्चय भी अपने-अपने स्थान पर अद्भुत हैं। अंत में उन्होंने कहा कि यदि रामायण के सद्गुण रूपी इत्र की कुछ बूंदें भी किसी के जीवन में आ जाएं, तो जीवन में आने वाली कठिनाइयाँ समाप्त हो जाएंगी और चारों ओर सद्गुणों की सुगंध फैल जाएगी। इससे जीवन खुशहाल और आनंदमय बन जाएगा।

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