महाराष्ट्र जैन वार्ता
पुणे : जिन आराध्य गुरुदेव आचार्य भगवंत को आपने दो हाथों से नमस्कार किया, उन्हीं गुरुदेव ने आपको आठ दिन, नौ दिन, ग्यारह दिन हज़ारों हाथों से संभाला। कल्पना कीजिए, अगर उन्होंने यह सामर्थ्य न दी होती, यह शक्ति न दी होती, तो आज यह आराधना आपसे हो ही नहीं पाती। इसलिए आपके भीतर जो श्रद्धा और भक्ति है, उसे पूरे मन से अनुभव कीजिए ऐसा संदेश प. पू. प्रवीणऋषिजी म. सा. ने अपने प्रवचन में दिया। यह प्रवचन परिवर्तन चातुर्मास 2025 के अंतर्गत आयोजित प्रवचनमाला में हुआ।
प. पू. प्रवीणऋषिजी म. सा. ने कहा कि गुरुदेव के प्रति भक्ति के कारण जब तप करने की प्रेरणा मन में आती है, वही क्षण अत्यंत मूल्यवान होता है। साथ ही, जिन्होंने आपको तपस्या करने के लिए प्रेरित किया, समर्थन और अनुमोदन दिया, उनका भी आज स्मरण करें। उस पहले क्षण से लेकर आज तक जो तपस्या की यात्रा चली है, उसे पूर्ण करना ही हमारा लक्ष्य है।
जिनसे आपको भगवान, धर्म और गुरु के प्रति श्रद्धा और भक्ति का बीज मिला अपने ऐसे कुल, परिवार, संघ और समाज का भी भावपूर्वक स्मरण करें। तीर्थंकर भगवान महावीर ने बिना पानी ग्रहण किए, बिना सोए, बिना बैठे लगातार छह महीने तपस्या की।
उन्होंने साधना के माध्यम से यह जाना कि पवित्र शक्ति को किस प्रकार जाग्रत किया जा सकता है। इसलिए उनके द्वारा की गई साधना का स्मरण करें और उस तपस्या की गहराई को समझने का प्रयास करें। तप का मार्ग दिखाने से पहले उन्होंने कितनी महान साधना पूर्ण की यह जानकर उनके चरणों में स्वयं को अर्पित कर देना चाहिए।
इसीलिए ऐसे कठोर, दीप्त और घोर तपस्वियों को नमन करना चाहिए। तपस्वियों की साधना की कंपन और उनकी तपश्चर्या की शक्ति किस प्रकार अनजाने में हममें अवतरित हुई होगी यह उनके अदृश्य कृपा का ही एक स्वरूप है।
उन्हीं के कारण आज हमारी तपस्या पूर्णता की ओर पहुंच सकी है। जिन्होंने प्रभु से आपकी नाल जोड़ी, उन आराध्य गुरुदेव का स्मरण करें। उनके प्रति आपकी कृतज्ञता उनके चरणों में समर्पित होकर हृदय की गहराइयों से प्रकट करें।
उन्होंने जो कृपा की है, उसे मन के गहराई से अनुभव करें। तीर्थंकर परमात्मा और आराध्य गुरुदेव की करोड़ों तपस्याओं की शक्तियों को भक्ति और श्रद्धा के बल से ग्रहण करने की क्षमता उन्होंने हमें दी है। अतः यह श्रद्धा हम पर निरंतर बनी रहे।
जब तक यह श्रद्धा बनी रहे, जब तक यह अखंड भक्ति बनी रहे, और जब तक मुझे सिद्ध स्वरूप प्राप्त नहीं होता तब तक मैं आपके चरणों में लीन रहूं। जब तक मुझे आपके आचरण का बल प्राप्त नहीं होता तब तक आपके निरंतर वरदान की वर्षा मुझ पर होती रहे।
प. पू. प्रवीणऋषिजी म. सा. ने कहा, भविष्य में मेरी तपस्या के संबंध में मेरे मन में कभी भी ‘अहं’ का भाव या अहंकार उत्पन्न न हो ऐसा आशीर्वाद प्रभु मुझे अवश्य दें। मेरी तपस्या को उत्कृष्ट, सफल और विशुद्ध बनाने के लिए तीर्थंकर परमात्मा, गुरुदेव, परिवार और संघ की व्यवस्था का योगदान है यह भाव सदा मेरे मन में बना रहे। और जो लोग मुझे मेरे सिद्ध स्वरूप की दिशा में आगे ले जाएंगे उनके समस्त दोषों का क्षय हो ऐसा भाव भी मेरे मन में बना रहे।
