महाराष्ट्र जैन वार्ता
पुणे : जो भी कार्य करें, उसमें प्रसन्नता अवश्य होनी चाहिए। प्रसन्नता के साथ किया गया कोई भी कार्य आनंद और संतोष प्रदान करने वाला होता है। प्रसन्न वृत्ति के साथ भावपूर्ण जीवन जीना हमें सीखना चाहिए, ऐसा प्रतिपादन प. पू. प्रवीणऋषिजी म. सा. ने किया। परिवर्तन चातुर्मास 2025 के अवसर पर आयोजित प्रवचनमाला में वे बोल रहे थे।
प. पू. प्रवीणऋषिजी म.सा. ने कहा कि स्वभावतः मनुष्य के व्यक्तित्व में अनेक भावनाओं के रंग बिखरे होते हैं। इन भावनाओं के रंगों का हम किस प्रकार उपयोग करते हैं और अपना जीवन सुंदर बनाते हैं, यह हमारे हाथ में है।
जो भी क्रिया हम करने जा रहे हैं, उसके प्रति हमारे भाव कैसे हैं और हम उसे कितनी श्रद्धा से करते हैं, उसी पर मिलने वाला आनंद और संतोष निर्भर करता है। अर्थात, किसी भी क्रिया के पीछे के भाव की जांच करनी चाहिए, या जो वस्तु हमें प्राप्त हुई है, उसमें हम कितना आनंद और संतोष मानते हैं, यह देखना चाहिए।
उदाहरण के लिए, किसी व्यक्ति को करोड़ों रुपये मिलें, फिर भी वे उसे तुच्छ लग सकते हैं; लेकिन किसी को एक कौड़ी भी मिले तो वह उसे करोड़ों के समान मान सकता है। जिसके मन के भाव संकुचित प्रवृत्ति के होते हैं, उसे कृष्णलेश्या कहा जाता है, और जिसके भाव उदार प्रवृत्ति के होते हैं, उसे शुक्ललेश्या कहा जाता है।
आपकी लेश्या, अर्थात आपके भाव, प्रसन्न होने चाहिए। मन की समृद्धि होना आवश्यक है, किसी वस्तु को देखते समय आपके भाव कैसे हैं, यह महत्वपूर्ण है। प. पू. प्रवीणऋषिजी म. सा. ने कहा कि किसी विषय पर व्यक्त होते समय यह देखना आवश्यक है कि आपके विचार किस भाव से व्यक्त हो रहे हैं।
आपके शब्दों के पहुँचने से पहले ही आपके व्यक्तित्व, आपकी आँखों और आपके स्पर्श से आपके भाव सामने वाले तक पहुँच जाते हैं। जैसे कुछ प्राप्त करने में आनंद होता है, वैसे ही देने में भी आनंद अनुभव करना चाहिए।
जैसे भोजन करते समय आनंद लेते हैं, वैसे ही भोजन परोसते समय भी आनंद और संतोष अनुभव होना चाहिए। अर्थात, यदि आपकी वृत्ति और क्रिया में आनंद है, तो व्यक्त होते समय आपके भाव भी प्रसन्न रहेंगे।
यदि किसी कार्य को करते समय आपके भाव प्रसन्न हों, तो ईश्वरीय सुख का अनुभव होता है। भले ही हम किसी को हमेशा सुखी न रख पाएं, परंतु सुखी रखने का प्रयास अवश्य कर सकते हैं। हम भले ही किसी का दुख दूर न कर पाएं, लेकिन उसके दुख पर मरहम अवश्य लगा सकते हैं।
अपनी भावनाओं को प्रसन्न रखने के लिए सबसे पहले अपने मन में भक्ति का भाव उत्पन्न करना आवश्यक है। इसी भक्ति से आनंद जन्म लेता है। इसके लिए अपने विचारों में परिपक्वता लानी होगी। आनंद और संतोष पाने के लिए केवल उनका पीछा करने से वे नहीं मिलते; हमें उन्हें ढूँढना और महसूस करना आना चाहिए।
साधारण वस्तु को जब असाधारण ढंग से प्रस्तुत किया जाता है, तब वह वस्तु और प्रस्तुत करने वाला दोनों असाधारण बन जाते हैं। साधारण, सरल वस्तुओं को हम अक्सर लापरवाही से देखते हैं; लेकिन यदि इन सरल चीज़ों को अधिक आनंद और सही तरीके से किया जाए, तो उसका लाभ हमारे व्यक्तित्व के निर्माण में होता है।
