संपत्ति साध्य नहीं, बल्कि साधन है” – प. पू. प्रवीणऋषिजी म. सा.
महाराष्ट्र जैन वार्ता परमात्मा ने कहा है कि परिग्रह (संपत्ति का संग्रह) पाँचवाँ पाप है। हम परिग्रह को हमेशा धन और संपत्ति के रूप में देखते हैं, इसीलिए उससे मुक्त होने की इच्छा भी नहीं होती। जितना अधिक व्यक्ति इसमें उलझता है, उतना ही अधिक पाप उसके साथ जुड़ता जाता है। लेकिन जो व्यक्ति इस … Read more